Description
भारती जी ने इस किताब में जो किया वो उस ज़माने में बहुत कम लोग कर रहे थे। प्रेम को romantically नहीं, बल्कि उसकी सारी तकलीफ़, उसके सारे अधूरेपन के साथ दिखाया। हर औरत का किरदार — चाहे जमुना हो, सत्ती हो, या लिली — कोई एक dimension नहीं रखता। सब अपनी जगह पूरी हैं, और अपनी जगह टूटी हुई भी।
माणिक मुल्ला कोई hero नहीं है इस किताब का। वो बस एक आदमी है जो ज़िंदगी देख रहा है, याद कर रहा है, और किसी नतीजे पर नहीं पहुँचता। शायद इसीलिए यह किताब इतनी सच्ची लगती है।
1988 में श्याम बेनेगल ने इस पर फ़िल्म भी बनाई। नसीरुद्दीन शाह ने माणिक मुल्ला का किरदार निभाया था। फ़िल्म उतनी ही layered निकली जितनी किताब।






Reviews
There are no reviews yet.