राग दरबारी

1968 में लिखी गई। साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला 1969 में। हिंदी के सबसे बड़े व्यंग्य उपन्यासों में गिनी जाती है — बल्कि कई लोग कहते हैं सबसे बड़ा।

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Description

श्रीलाल शुक्ल ने इस किताब में जो किया वो बहुत कम लोग कर पाते हैं — उन्होंने व्यवस्था का मज़ाक उड़ाया, पर रोते हुए नहीं, हँसते हुए। और वो हँसी ऐसी है जो गले में अटक जाती है।

गाँव का मुखिया वैद्यजी है — सब जानते हैं वो क्या है, पर सब उनसे डरते हैं। स्कूल का हेडमास्टर है जो कभी पढ़ाता नहीं। अस्पताल है जहाँ दवाई नहीं। और इन सबके बीच रंगनाथ खड़ा है — हैरान, परेशान, और धीरे-धीरे यह समझता हुआ कि यहाँ बदलाव की कोई जगह नहीं।

यह उपन्यास 1960-70 के दशक के भारत का आईना है। पर आज पढ़ो — लगता है कल की बात है। यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है।

एक scene है जिसमें गाँव की पंचायत बैठती है किसी मामले को सुलझाने के लिए। घंटों बहस होती है। नतीजा — कुछ नहीं। शुक्ल जी ने उसे इतनी बारीकी से लिखा है कि पढ़ते हुए हँसी आती है — और फिर अचानक रुक जाती है।

Additional information

Weight 1 lbs
Dimensions 25 × 30 × 10 in
book-author

श्रीलाल शुक्ल

Published

January 1, 1968

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