Description
जब पहली बार बच्चन जी ने यह कविता पढ़ी थी मुशायरे में — भीड़ चुप हो गई थी। फिर तालियाँ रुकी नहीं। यह बात उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा में लिखी है।
एक रुबाई है जो सबसे ज़्यादा याद की जाती है — मंदिर-मस्जिद के झगड़े छोड़कर मधुशाला चलो। जब 1935 में यह लिखा गया था, उस वक़्त का भारत याद करो — और समझ आएगा कि यह सिर्फ़ कविता नहीं थी, एक बयान था।
कवर पर लिखा है — मधुशाला के गौरवशाली 75 साल। यानी यह edition उस anniversary को celebrate करते हुए निकाला गया। और दुर्लभ चित्र — बच्चन जी की पुरानी तस्वीरें, उस ज़माने के documents — यह सब इस edition को एक collector’s item बनाते हैं।
अमिताभ बच्चन ने अपने पिता की यह कविता कई बार पढ़ी है — उनकी आवाज़ में मधुशाला सुनना एक अलग ही अनुभव है। पर किताब में पढ़ना और भी अलग है। हर रुबाई पर रुको, सोचो — हर बार कुछ नया मिलता है।






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