मधुशाला

418.79

1935 में लिखी गई। हरिवंश राय बच्चन तब 27-28 साल के थे। पहली पत्नी श्यामा की मृत्यु का दर्द था, इलाहाबाद का माहौल था, और भीतर कुछ उबल रहा था जो बाहर निकला — मधुशाला बनकर।

- +

Info:

SKU: BW-100310 Categories:, , , ,

Description

जब पहली बार बच्चन जी ने यह कविता पढ़ी थी मुशायरे में — भीड़ चुप हो गई थी। फिर तालियाँ रुकी नहीं। यह बात उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा में लिखी है।

एक रुबाई है जो सबसे ज़्यादा याद की जाती है — मंदिर-मस्जिद के झगड़े छोड़कर मधुशाला चलो। जब 1935 में यह लिखा गया था, उस वक़्त का भारत याद करो — और समझ आएगा कि यह सिर्फ़ कविता नहीं थी, एक बयान था।

कवर पर लिखा है — मधुशाला के गौरवशाली 75 साल। यानी यह edition उस anniversary को celebrate करते हुए निकाला गया। और दुर्लभ चित्र — बच्चन जी की पुरानी तस्वीरें, उस ज़माने के documents — यह सब इस edition को एक collector’s item बनाते हैं।

अमिताभ बच्चन ने अपने पिता की यह कविता कई बार पढ़ी है — उनकी आवाज़ में मधुशाला सुनना एक अलग ही अनुभव है। पर किताब में पढ़ना और भी अलग है। हर रुबाई पर रुको, सोचो — हर बार कुछ नया मिलता है।

Additional information

book-author

हरिवंश राय बच्चन

Published

January 1, 1935

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “मधुशाला”

Your email address will not be published. Required fields are marked *