Description
19वीं सदी की बात है। भारत में अकाल था, ग़रीबी थी, और अंग्रेज़ों के दलाल गाँव-गाँव घूमते थे — काम का लालच देकर लोगों को भरती करते थे। मॉरीशस, फ़िजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद — इन जगहों पर हज़ारों भारतीय पहुँचे। पर जो वादा था वो कभी पूरा नहीं हुआ।
अनत जी ने इस दर्द को fiction में उतारा — पर यह सिर्फ़ fiction नहीं लगता। हर किरदार में कोई असली इंसान नज़र आता है। गन्ने के खेत, कोड़े, टूटे हुए सपने — और फिर भी एक ज़िद कि ज़िंदा रहना है।
यह किताब सिर्फ़ इतिहास नहीं है। यह उन लोगों को आवाज़ देती है जिनकी कोई आवाज़ नहीं थी। जिनके नाम किसी दस्तावेज़ में नहीं — बस खेतों में उनका पसीना रह गया। लाल पसीना।
कवर के ऊपर जो lines हैं — धुंधली ज़रूर हैं, पर शायद किसी reviewer या पुरस्कार का उल्लेख है, क्योंकि यह उपन्यास काफ़ी सम्मानित रहा है हिंदी साहित्य में।






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