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कितने पाकिस्तान

कितने पाकिस्तान

₹259.65

कमलेश्वर की कालजयी रचना “कितने पाकिस्तान” हिंदी साहित्य का वह महाग्रंथ है जो इतिहास, धर्म, राजनीति और मानवता के सबसे जटिल प्रश्नों से सीधा टकराता है। यह उपन्यास विभाजन की त्रासदी को केवल भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में नहीं, बल्कि सदियों के मानवीय इतिहास में फैले असंख्य विभाजनों के परिप्रेक्ष्य में देखता है। आदम की अदालत में इतिहास के महान व्यक्तित्वों को तलब किया जाता है और उनसे पूछा जाता है कि उन्होंने मनुष्य को मनुष्य से क्यों बाँटा। यह उपन्यास पढ़कर मन में एक ऐसी बेचैनी जागती है जो आपको बार-बार सोचने पर मजबूर करती है। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित यह कृति हर जागरूक पाठक के संग्रह में होनी चाहिए।

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Info:

SKU: BW-100315 Categories:Arts & Literature, Classic, Fiction, Genre Fiction, India, Literature & Fiction

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Description

“कितने पाकिस्तान” कमलेश्वर का वह उपन्यास है जिसने हिंदी साहित्य जगत को हिलाकर रख दिया और जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन् २००० में प्रकाशित यह रचना अपनी संरचना, विचार और भाषा तीनों दृष्टियों से हिंदी साहित्य की एक अभूतपूर्व उपलब्धि है।

उपन्यास की केंद्रीय संकल्पना अत्यंत मौलिक और साहसी है — आदम नामक एक पात्र की कल्पनालोक की अदालत में इतिहास के विभिन्न कालखंडों से महान और कुख्यात व्यक्तित्वों को बुलाया जाता है। सिकंदर, हिटलर, बाबर, औरंगज़ेब, गाँधी, जिन्ना — सभी को कटघरे में खड़ा किया जाता है और उनसे पूछा जाता है कि उन्होंने अपने-अपने युग में मनुष्यता को कितनी बार और कितने टुकड़ों में बाँटा। “पाकिस्तान” यहाँ केवल एक देश का नाम नहीं, बल्कि हर उस विभाजन का प्रतीक है जो धर्म, जाति, नस्ल या राजनीति के नाम पर मनुष्य और मनुष्य के बीच खींचा गया है।

कमलेश्वर ने इस उपन्यास में इतिहास, मिथक, दर्शन और समकालीन राजनीति को एक साथ बड़ी कुशलता से बुना है। उनकी भाषा में पत्रकारिता की धार और साहित्य की गहराई दोनों एक साथ मिलती हैं। यह उपन्यास पाठक को इतिहास के प्रति अपनी समझ पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करता है।

यह पुस्तक उन सभी पाठकों के लिए अनिवार्य है जो इतिहास, राजनीति और मानवीय संवेदना के अंतर्संबंध को साहित्य के माध्यम से समझना चाहते हैं। शोधार्थियों, पत्रकारों, इतिहासप्रेमियों और गंभीर साहित्यप्रेमियों के लिए यह एक ऐसी कृति है जो बार-बार पढ़ी जानी चाहिए।

Additional information

Published

January 1, 2000

Number of Page

361

Book-Author

कमलेश्वर

Format

Paperback

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