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Gaban

गबन

₹349.00

मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना “गबन” मानव मन की उस कमज़ोरी की कहानी है जो एक छोटी-सी लालसा को धीरे-धीरे जीवन के सबसे बड़े पतन में बदल देती है। रमानाथ और जालपा की यह कहानी केवल एक दाम्पत्य जीवन की कथा नहीं — यह उस मध्यवर्गीय मानसिकता का दर्पण है जो दिखावे और झूठी प्रतिष्ठा की चाह में अपना सब कुछ दाँव पर लगा देती है। आभूषणों की चमक में खो जाने वाले एक युवक का नैतिक पतन और उससे उबरने की संघर्षयात्रा इस उपन्यास को आज भी उतना ही प्रासंगिक बनाती है। प्रेमचंद की सरल किंतु गहरी भाषा में लिखी यह रचना एक बार पढ़ना शुरू करने पर छोड़ना मुश्किल हो जाता है।

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SKU: BW-100319 Categories:Arts & Literature, Fiction, Genre Fiction, Literature & Fiction

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Description

“गबन” मुंशी प्रेमचंद द्वारा सन् १९३१ में रचित एक ऐसा उपन्यास है जो मानवीय लालसा, नैतिक पतन और पश्चाताप की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी गाथा प्रस्तुत करता है। आवरण पर “एक कालजयी क्लासिक” के रूप में वर्णित यह रचना आज भी उतनी ही ताज़ी और प्रासंगिक है जितनी अपने प्रकाशन के समय थी।

उपन्यास के केंद्र में हैं रमानाथ — एक महत्त्वाकांक्षी, भावुक और कमज़ोर इरादों वाला युवक — और उसकी पत्नी जालपा, जिसे आभूषणों से अगाध प्रेम है। पत्नी की इच्छाओं को पूरा करने की चाह और समाज में सम्मान बनाए रखने की ललक में रमानाथ सरकारी धन का गबन कर बैठता है। यह एक गलती उसके पूरे जीवन को उलट-पुलट कर देती है। वह घर छोड़कर भाग जाता है, कलकत्ता पहुँचता है और वहाँ अपराध की दुनिया में और गहरा धँसता चला जाता है।

परंतु इस उपन्यास की असली नायिका है जालपा — जो पहले आभूषणों की दीवानी है, लेकिन पति के पतन के बाद एक सशक्त, स्वावलंबी और साहसी स्त्री के रूप में उभरती है। प्रेमचंद ने जालपा के चरित्र के माध्यम से यह दिखाया है कि स्त्री की वास्तविक शक्ति आभूषणों में नहीं, उसके संकल्प और आत्मविश्वास में है। स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि भी इस उपन्यास में सुंदर ढंग से बुनी गई है।

श्वेत-श्याम आवरण पर दूर जाती रेलगाड़ी का चित्र उस पलायन और अनिश्चितता का प्रतीक है जो रमानाथ के जीवन में आती है। यह पुस्तक विद्यार्थियों, साहित्यप्रेमियों, नैतिक मूल्यों में रुचि रखने वाले पाठकों और प्रेमचंद के समग्र साहित्य को जानने के इच्छुक सभी पाठकों के लिए एक अनिवार्य पठन है। “गबन” पढ़कर पाठक स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछता है — क्या हम भी अपने जीवन में कहीं न कहीं ऐसे ही किसी “गबन” के शिकार तो नहीं हो रहे?

Additional information

Published

January 1, 1931

Number of Page

272

Book-Author

मुंशी प्रेमचंद

Format

Paperback

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