Description
“चित्तकोबरा” मृदुला गर्ग का वह उपन्यास है जिसने हिंदी साहित्य में स्त्री-लेखन को एक नई और साहसी दिशा दी। यह उपन्यास एक ऐसी विवाहित स्त्री की कहानी कहता है जो अपने वैवाहिक जीवन की एकरसता और भावनात्मक रिक्तता के बीच एक दूसरे पुरुष के साथ गहरे प्रेम संबंध में बँध जाती है। यह संबंध केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि दो चेतनाओं के बीच का एक गहरा, बौद्धिक और भावनात्मक संवाद है।
लेखिका ने इस उपन्यास में स्त्री की देह, मन और आत्मा की स्वायत्तता का प्रश्न बड़ी निर्भीकता से उठाया है। समाज द्वारा थोपी गई नैतिकता और स्त्री की अपनी आंतरिक नैतिकता के बीच का यह संघर्ष उपन्यास को एक दार्शनिक गहराई प्रदान करता है। मृदुला गर्ग की भाषा अत्यंत समृद्ध, लयात्मक और चिंतनशील है — वे शब्दों से ऐसे चित्र बनाती हैं जो मन पर स्थायी छाप छोड़ जाते हैं।
यह उपन्यास अपने प्रकाशन के समय विवादों में भी रहा — अश्लीलता के आरोप लगे, लेखिका की गिरफ्तारी तक की नौबत आई। परंतु समय ने सिद्ध किया कि यह रचना हिंदी साहित्य की एक मील का पत्थर है। यह उन सभी पाठकों के लिए है जो साहित्य में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन के गहरे सत्य की तलाश करते हैं। नारीवादी दृष्टिकोण से रुचि रखने वाले पाठकों, साहित्य के विद्यार्थियों और हिंदी गद्य की श्रेष्ठ रचनाओं के प्रेमियों के लिए “चित्तकोबरा” एक अनिवार्य पठन है। इसे पढ़ना अपने भीतर के कई बंद दरवाज़े खोलने जैसा अनुभव है।






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